
by Mahadevi Verma
महादेवी वर्मा संचयिता -
महादेवी वर्मा की प्रगतिशीलता केवल स्त्री सम्बन्धी प्रश्नों तक ही सीमित नहीं थी। उन्होंने इसके अलावा भी तमाम सामयिक प्रश्नों की विस्तार से विवेचना कर हमारे वर्तमान समय के बारे में भी सोचने की मजबूरी पैदा की। पिछड़े वर्गों से आने वाले शिक्षार्थियों की समस्या आज़ादी के पचपन वर्ष बाद भी पूरी तरह सुलझी नहीं है।
महादेवी के ऐसे तमाम लेखों का बहुत बड़ा आकर्षण रचनाकार का साहसी व्यक्तित्व है। उन्होंने न जीवन में भय माना न लेखन में उनकी निडर बनावट ने ही उन्हें ज़रूरत पड़ने पर औरों के साथ ख़ुद अपने ख़िलाफ़ खड़े होने की क्षमता दी। परिवार, धर्म, परम्परा, समाज, राजसत्ता किसी का वर्चस्व उन्हें भयभीत नहीं कर सका। उन्होंने अपने समय में पढ़ने की ही नहीं वेद पढ़ने की ज़िद की। गृहस्थ जीवन का परित्याग करके छोटी उम्र में भिक्षुणी होने का निर्णय लेने में उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया उससे अधिक इस इरादे को छोड़ने में। इतना ही नहीं उन्होंने इस घटना के प्रेरक कारण का उद्घाटन करने में भी कोई संकोच नहीं किया और उसके बाद अपने निजी जीवन के सामने ऐसी अभेद्य दीवार खींच दी कि उसके भीतर ताक-झाँक करने या पूछताछ करने का अधिकार उन्होंने किसी को दिया नहीं और साहस किसी को हुआ नहीं। उसके बाद लोगों ने उतना ही जाना जितना उन्होंने स्वयं लिखकर बताया। गोकि इस पुस्तक में आत्म स्वीकृतियाँ भी हैं और रचना-प्रक्रिया का विवेचन काफ़ी बेबाक शैली में किया गया है।

by Mahadevi Verma
महादेवी वर्मा संचयिता -
महादेवी वर्मा की प्रगतिशीलता केवल स्त्री सम्बन्धी प्रश्नों तक ही सीमित नहीं थी। उन्होंने इसके अलावा भी तमाम सामयिक प्रश्नों की विस्तार से विवेचना कर हमारे वर्तमान समय के बारे में भी सोचने की मजबूरी पैदा की। पिछड़े वर्गों से आने वाले शिक्षार्थियों की समस्या आज़ादी के पचपन वर्ष बाद भी पूरी तरह सुलझी नहीं है।
महादेवी के ऐसे तमाम लेखों का बहुत बड़ा आकर्षण रचनाकार का साहसी व्यक्तित्व है। उन्होंने न जीवन में भय माना न लेखन में उनकी निडर बनावट ने ही उन्हें ज़रूरत पड़ने पर औरों के साथ ख़ुद अपने ख़िलाफ़ खड़े होने की क्षमता दी। परिवार, धर्म, परम्परा, समाज, राजसत्ता किसी का वर्चस्व उन्हें भयभीत नहीं कर सका। उन्होंने अपने समय में पढ़ने की ही नहीं वेद पढ़ने की ज़िद की। गृहस्थ जीवन का परित्याग करके छोटी उम्र में भिक्षुणी होने का निर्णय लेने में उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया उससे अधिक इस इरादे को छोड़ने में। इतना ही नहीं उन्होंने इस घटना के प्रेरक कारण का उद्घाटन करने में भी कोई संकोच नहीं किया और उसके बाद अपने निजी जीवन के सामने ऐसी अभेद्य दीवार खींच दी कि उसके भीतर ताक-झाँक करने या पूछताछ करने का अधिकार उन्होंने किसी को दिया नहीं और साहस किसी को हुआ नहीं। उसके बाद लोगों ने उतना ही जाना जितना उन्होंने स्वयं लिखकर बताया। गोकि इस पुस्तक में आत्म स्वीकृतियाँ भी हैं और रचना-प्रक्रिया का विवेचन काफ़ी बेबाक शैली में किया गया है।